Saturday, 20 April 2013

"सुबीते दिन" ( बाल कहानी )

आँगन के चौरे पर दादी खटिया बिछाये आराम से लेटी थीं , किसी भजन की कड़ियाँ गुनगुना रहीं थीं - " काहे न लेत प्रभु मोरी खबरिया , आन बसो नैनन में मोरे साँवरिया ।" छोटी पोती दौड़ती हुई आई और दादी के बगल मे लेट गई, उनका हाथ उठा कर अपने ऊपर रखते हुये बोली-"दादी तुम हमेशा साँवरिया को ही क्यों बुलाती रहती हो क्या वो तुम्हारे दोस्त है ?" उसके इस भोले से प्रश्न को सुनकर वहाँ मौजूद सभी खिलखिला कर हंस दिये और दादी कुछ शर्माते हुए बोली -" चल हट पगली, साँवरिया तो हम किशन कन्हैया को कहते है ।" "दादी  आप उनको साँवरिया ही क्यों कहती हैं, माँ तो मोहन कहती है" उसने फिर पूछा । दादी ने समझाया  ,"  अरे मेरी चमकी पुतरिया सुन  किशन  कन्हैया को ही हम मोहन, मुरलिया वाले, नटवर, नन्द किशोर, श्याम, साँवले, साँवरिया और भी कई नाम है जिन नामों से हम मदन मोहन को बुलाते  है। जैसे तुम्हारा नाम तो श्वेता है पर हम सब तुम्हें अलग अलग नामों से बुलाते  हैं ये तुम्हारे प्यार के नाम हैं वैसे ही किशन कन्हैया के भी प्यार के ढेरों नाम हैं।"  श्वेता आश्वस्त हो  गई। वहीं दादी के बगल मे ही लेट कर  सो गई । दादी प्यार से उसके सिर पर हाथ फिराती सोचने लगीं, "कितना अच्छ जीवन है इन नन्हें बच्चों का न इन्हे कोई चिंता न कोई फिकर,  बस मस्त स्वच्छंद जीवन होता है ।" वो भी बगल मे लेट कर धीरे से सो गई ।  कितने सुबीते  मे   थे  दोनों।   

              

Monday, 11 March 2013

शिरोमणि



कई वर्ष बीत गए। दुबारा उससे मुलाक़ात नहीं हुई ।  आज वो अचानक हमारे घर आया था । उसको देख मेरे आश्चर्य की सीमा न रही । जिसको मै देखा करती थी या जो उसके विषय मे कल्पना की थी। वह उससे एकदम  अलग था ।  वो व्हील चेयर  पर बैठा था उसका ड्राइवर  दरवाजे तक छोड़ गया था। मै पहले तो उसे पहचान ही नहीं पाई थी उसने अपना परिचय दिया -" दीदी मै शिरोमणि ! अंदर नहीं बुलाएंगी।" मैने कहा -" हाँ हाँ आओ अंदर आओ प्लीज़ । " और वह अपने हाथ से व्हील चेयर को धकेलता हुआ अंदर आ गया , मैंने उसकी चेयर पकड़ी -" लाओ मै ले चलूँ ।"  वो बड़े ही आत्म विश्वास से बोला - "नहीं दीदी , मै कर लूँगा । " और वह अपने आप ही अंदर तक आया । मै एक पल को अतीत मे खो सी गई ।
पतंग की डोर हाथ मे पकड़े सात आठ साल का वो बालक अपनी धुन मे भागा जा रहा था।  इधर उधर की कोई खबर न थी। बस उसकी निगाहें अपनी पतंग पर ही टिकी थी । कोई बड़े ज़ोर चिल्लाया - "क्या कर रहा है मरेगा क्या ?" तब वह आसमान से धरातल मे आया , सामने देखा गाड़ी वाला हार्न बजा रहा था और  उसने खुद को सड़क के  बीचोंबीच  खड़ा पाया । फुर्ती से किनारे हुआ और झट से उन गाड़ी वाले अंकल से क्षमा मांगी । वो ऐसा ही था अपनी धुन का पक्का , जिस काम को पकड़ता उस काम मे पूरी तरह रम जाता । चाहे खेल हो या पढ़ाई या घर मे माँ का हाथ बटाना हो या फिर दोस्तों के साथ मस्ती करना। अपने सभी भाई बहनों में सबसे ज्यादा होशियार और चंचल था वो ।  उसके माता पिता उससे हमेशा खुश रहते । उसके पिता अक्सर कहते देखना - "मेरा शिरोमणि एक दिन मेरा नाम अवश्य ऊंचा करेगा लोग मुझे शिरोमणि के बाप के रुप मे जानेंगे ।" और ऐसा कहते वक्त उनकी गर्दन गर्व से तन जाया करती चेहरे पर अव्यक्त खुशी झलक जाती । जिसका अहसास केवल शिरोमणि ही कर  पाता या उसकी माँ  । उसकी माँ रत्ना देवी बड़ी मेहनतकश महिला थीं । खाली बैठने से उन्हे सख्त चिढ़ थी । वे कम पढ़ी लिखी थी किन्तु किसी भी पढे लिखे से कम न थी । हर काम मे वे दक्ष थीं,  इतनी सधी और सटीक बात कहती कि उनके आगे बड़े बड़े झुक जाया करते । उन्होने अपने सभी बच्चों को भरपूर प्यार और संस्कार दिये थे । तभी तो सभी बच्चे बड़े ही सौम्य और सुसंस्कृत थे । 


फोटो गूगल से साभार

 मेरी जब शिरोमणि से मुलाक़ात हुई तब वह चार पाँच वर्ष का रहा होगा । वह उस विद्यालय मे पढ़ता था जहां मेरी नियुक्ति हुई थी । उस समय वह पहली कक्षा का छात्र था । मै जिस कालोनी मे रहती थी वहाँ से उसका घर थोड़ी ही दूरी पर था । इसलिए वह शाम को अक्सर मेरे पास भाग आता -" दीदी मुझे आपसे कुछ पूछना है ।" और आकर वह मेरे पास से जाना ही न चाहता । मोहन मणि, उसका बड़ा भाई जब उसे बुलाने आता तब भी वह बड़ी न नुकुर के बाद ही वह जाता । सच इतना मेधावी बालक  देख मुझे हैरानी होती। जो पढ़ने के लिए इतनी जिद करता था । एक दो बार मेरी उनकी माँ से मुलाक़ात हुई तब मैंने जाना कि बच्चा माँ जैसा ही है । वो कक्षा चार मे था जब मैंने विद्यालय छोड़ा । उस दिन वो बहुत रोया । मेरे लिए उसको समझाना बड़ा मुश्किल हो रहा था । मैंने उसे अपने नए घर का पता दिया और उससे कहा जब तुम्हारा मन हो मिलने आ जाना । थोड़ी बहुत औपचारिक बातों के बाद मैंने पूछा - " मणि ( मै उसे मणि कहा करती थी ) ये सब कैसे हुआ क्या कोई एक्सीडेंट ! " कुछ देर चुप रहा वो फिर बोला - " क्या बताऊँ दीदी आपके वहाँ से चले आने के बाद कुछ दिन तो मेरा उस स्कूल मे मन ही नहीं लगा , माँ के समझाने के बाद किसी तरह मै वापस लौट पाया । सातवीं कक्षा मे था माँ का स्वर्गवास हो गया और उनकी मृत्यु ने हम सबको तोड़ कर रख दिया हम पर मानो दुःखों का पहाड़ ही टूट पड़ा । पिताजी भी बीमार रहने लगे । बड़े भैया की  कैलिफोर्निया मे  नौकरी लग गयी थी वे चले गए अब घर पर  दीदी और मेरा छोटा भाई बचे । पैसे की कमी बड़े भैया कभी होने नही देते थे तो हमारी पढ़ाई अच्छे से हो गई दीदी की शादी होनी थी , पिताजी  कही जा नहीं सकते थे इसलिए बड़े भैया ने लड़का देखने की जिम्मेवारी मेरे ऊपर डाल दी थी । पर दीदी की शादी से पहले भैया की शादी तय हो गई , भैया ने शर्त रखी कि वे पहले बहन की शादी करवाएँ या इंतजार करें । लड़की वालों ने सोचा कि लड़का अच्छा है हाथ से निकल जाएगा इसलिए उन्होने बहन के लिए लड़का  खोजना शुरू कर दिया । जल्द ही दीदी  की शादी तय हो गई । भैया और दीदी दोनों की शादी एक ही हफ्ते मे दो दिन के अंतर पर हो गई । शादी के बाद दीदी ससुराल चली गई और भैया भाभी  को साथ लेकर चले गए । अब उनका फोन आना भी कम हो गया था हमारे फोन करने पर भाभी फोन उठातीं और बस दो चार बात करके फोन काट  देतीं भैया को कभी बताती भी या नहीं , मालूम नहीं । पिताजी को कैंसर हो गया था , वे भैया भाभी से मिलना चाहते थे । रोज उनकी तकलीफ देखकर मै भैया को फोन करता , पर भैया व्यस्तता के कारण न आ पाने की बात कहते और मुझे तमाम  बातें समझा देते । एक दिन पिताजी भी अपनी बीमारी से न लड़ सके और चल दिये सदा के लिए । अब मै अकेला रह गया किसे अपने मन की बात सुनाता । भैया दीदी आए भी मेरे विवाह की बात करने , लेकिन मै  कोई अच्छी नौकरी किए बिना विवाह नहीं करना चाहता था । सब थोड़ा बिगड़े और चल दिये अपने रास्ते । शादी के बाद भैया काफी बदल गए थे। उनका अपना परिवार हो गया था उसकी चिंता उन्हे पहले करनी थी । मै पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर एम बी ए करना चाहता था मैंने भैया से कहा उन्होने खुशी से  कहा - बिलकुल करो पर साथ ही कोई पार्ट टाइम जॉब भी कर लो तुम्हारा खर्च भी निकल आयेगा । मैंने उनकी बात मान ली नौकरी ढूढ़ने लगा। एक मल्टीनेशनल कंपनी मे पार्ट टाइम जॉब मिल गयी । मै बड़ी खुशी से कई सपने बुनते हुए  घर की तरफ आ ही रहा था कि एक तेज रफ्तार कार ने जोरदार टक्कर मारी मै उछल  कर गिरने तक होश मे था। फिर मुझे याद नहीं कि क्या हुआ । मै अस्पताल मे था मेरे कूल्हे की हड्डी टूट गयी थी दूसरे पाँव की हड्डी बीच से आधी  हो गई थी  । मेरे सारे सपने , सारी इच्छाए सब चकनाचूर हो गए थे । मेरे पिताजी का सपना चूर चूर हो गया था । मै बहुत रोया । माँ बाबू जी बहुत याद आए पर नियति के आगे झुकने के सिवा कोई रास्ता भी न था । भैया भाभी आए मिले और चले गए दीदी और जीजा जी अक्सर आ जाते पर वो भी कितना समय दे पाते । मेरा कष्ट तो जीवन भर का था । कूल्हे की हड्डी जुड़ गयी थी उठ कर बैठने मे छह महीने लगे , अब अगला कदम खड़े होने का था । यहाँ किस्मत ने धोखा दे दिया । दोनों टांगों मे ब्लड सर्कुलेशन जीरो हो गया था । काफी देखभाल और फिजिकल एकसरसाइज़ की जरूरत थी । दो वर्षों तक एकदम बिस्तर पर पड़े पड़े पागल सा हो गया था । एक नर्स जो मेरी देखभाल किया करती थी एकदिन उसने मुझसे प्रणय निवेदन किया । मैंने सोचा शायद मेरे पर तरस खाकर वह ऐसा कह रही है । मैंने उसे झिड़क दिया वो कुछ न बोली चुपचाप चली गई । कई दिनो तक वह मेरे कमरे मे न आई। डाक्टर से उसके विषय मे पूछा । डाक्टर ने बताया की वह परीक्षा देने अपने होम टाउन गई है , पढ़ाई की बात सुनकर मेरे मन मे हूक सी उठी मेरा भी मन किया कि  क्यो न यहाँ पड़े पड़े पढ़ाई कर ली जाए । मैंने डाक्टर से कहा कि क्या वे कुछ किताबों का इंतजाम कर देंगे। उन्होने तुरंत हाँ कर दी , एक वे ही मेरे सुख दुःख के साथी थे उन्होने ही पिताजी का भी इलाज किया था।  पिताजी के चले जाने के बाद उन्होने एक पिता कि तरह ही मेरी देखभाल की । मैंने कुछ किताबों के नाम लिख कर दे दिये उन्होने वे किताबे मँगवा दीं । मैंने पढ्ना शुरू कर दिया वही रह कर एम बी ए की तैयारी पूरी कर ली । सेहत मे भी सुधार आने लगा था क्योकि जब जीने की इक्षा हो तो सेहत भी सही रहने लगती है । डाक्टर अंकल ने फार्म भी भरवा दिया , अब मेरे अंदर जोश जाग उठा था । दुगनी लगन से पढ़ाई की और  परीक्षा पास कर ली उन्होने ही एक कंपनी मे इंटरव्यू करवाया विकलांग कोटे  से   जॉब मिल गयी । आज मै उस कंपनी का एम डी हूँ । कंपनी ने मुझे फ्लैट और गाड़ी भी दे रखी है । काफी कष्टों के बाद ये मुकाम पाया है । आज मै अपने जीवन मे संतुष्ट हूँ । "
मेरे पूछने पर कि शादी की कि नहीं तो वो बोला - " की न मारिया से,  वही नर्स । "
मुझे लगा कि सच मे वो " यथा नाम तथा गुण " की कहावत को चरितार्थ कर रहा है ।  
  

Monday, 4 March 2013

कहाँ है मेरा घर


शाम का समय था यही कोई चार बजे होंगे जब हम सब हरिद्वार पहुंचे । मैंने सोचा चलो अभी गंगा स्नान कर आती हूँ अन्यथा वहाँ शाम की आरती  के लिए बहुत भीड़ हो जाएगी बच्चों और माँ को स्नान कर पाना मुश्किल होगा । बच्चे अपनी नानी का हाथ पकड़े आगे चले गए थे मुझे कमरे को बंद कर निकलना था तो मै पीछे रह गई जब तक मै पहुंची सब नहाने धोने मे लगे थे । गंगा के किनारे सीढ़ियों पर धीरे धीरे चढ़ती हुई वो वृद्धा हाथ मे बड़ा सा कलसा लिए वो भी जल से भरा था जिनकी उम्र करीब नब्बे वर्ष के आसपास रही होगी , जितनी उनकी उम्र थी उसकी चौगुनी झुर्रियां उसके शरीर पर थी । परंतु मुख पर तेज था वो देखने से काफी फुर्तीली नजर आ रही थी । मै सीढ़ियाँ उतर रही थी ज्यादा भीड़ भाड़ न होने की वजह से मै थोड़ा आराम से चल रही कि मेरी नजर उन पर पड़ी उनकी तरफ बढ़ते हुए मैंने सोचा शायद वे चल नहीं पा रही है मै उनकी मदद कर देती हूँ । मैंने बढ़ कर उनको पकड़ा – “ अम्मा जी आप अकेले ही चली आईं कोई  साथ नहीं है क्या ?इतनी उम्र हो चली है आपकी कहीं आप फिसल जाती ।" हँसते हुए उन्होने जवाब दिया – “ नहीं बेटा दुनिया मे अकेली ही आई थी किसी को भी साथ लेकर नहीं आई थी , सारे रिश्ते तो यहीं बने थे यही टूट भी गए ।” और आगे बढ़ने लगीं । मैंने फिर कहा – “ लाइये अम्मा जी मै आपका कलसा ऊपर पहुंचा देती हूँ । ’ वे बोली – “ बेटा ये तो मेरा रोज का काम है , मै रोज सुबह शाम आती हूँ , नहाती हूँ और अपने भोले बाबा को नहलाती हूँ , तुम न परेशान हो जाओ तुम ।” मै वहीं खड़ी उन्हे ही देखती रही वे झटपट सीढ़ियाँ चढ़ गईं और वहीं घाट पर बने शिव जी के मंदिर मे चली गईं । मै पूरा समय उनके विषय मे ही सोचती रही । मन बहुत व्यथित था उनसे मिलने और उनके विषय मे जानने की इच्छा बलवती हो रही थी । अगले दिन सुबह जल्दी ही उठ कर उसी घाट पर पहुंची जहां वो महिला मिली थी ,पर वो वहाँ न दिखी वहीं इंतजार करना ज्यादा उचित लगा सो वहों बैठ गई । थोड़ी देर मे वे आ गईं तब तक मै स्नान वगैरह से निवृत्त हो चुकी थी । और उनका पूजन भी समाप्त हो गया था । मै लपक कर उनकी ओर बढ़ी – अम्मा जी आपसे कुछ बाते करनी है।” वे हंस दी – वहीं मंदिर के बाहर ही हम दोनों बैठ गए । “बोल क्या बात करना चाहती है ? मुझे तो कल ही लगा था कि तू मेरी बात से अभी संतुष्ट नहीं हुई है , तू मेरे पास फिर आएगी जरूर।“ मैंने कहा – अम्मा जी आप यहाँ कब से रह रही है , या आप यही की रहने वाली है और अगर यहीं की रहने वाली है तो अकेले क्यों इस उम्र मे भटक रही है ।” और भी जितने प्रश्न मेरे मानस पर उभरे थे सभी एक एक कर कह डाले।  वे हंसी पर इस बार हंसी मे दर्द उभर आया था । कुछ सोंचने लगी और उनकी आंखे भर आई आँसू लुढ़क कर बहने लगे । मैंने कहा -“ अम्मा जी आपको तकलीफ देना नहीं चाहती आप न बताना चाहे तो न बताए कोई बात नहीं ।” वे बोली – “नहीं बेटा ऐसी बात नहीं है मर्ज जब पुराना हो जाता है तब नासूर बन जाता है और नासूर कभी कभी धोखा दे देता है । मै अल्मोड़ा की रहने वाली थी पर जीवन ने ऐसा भटकाया कि अब तो ठीक से यह भी याद नहीं कि मै कहाँ कहाँ रही हूँ आज जीवन के अंतिम पड़ाव पर मै यहाँ अपने भोले बाबा की शरण मे हूँ और दीन दुःखियों की सेवा कर लेती हूँ मुझे बड़ा सुख मिलता है । फिर वे कहीं खो सी गई - " जब जन्म हुआ उसी के दो घंटे बाद माँ चल बसी । पिता ने कुलक्षणी कहकर ठुकरा दिया । आजी (दादी )के पास रही , बिन माँ की बच्ची थी तो प्यार दुलार की उम्मीद तो खत्म हो गई थी, फिर भी आजी ने बड़े प्यार से पाला था । लेकिन मेरी फूटी किस्मत आजी भी जल्द ही परलोक सिधार गईं ,पिता ने दूसरा ब्याह कर लिया था नई माँ ले आए थे । सोचा शायद नई माँ के साथ खूब काम करूंगी तो प्यार मिल जाएगा , पर नई माँ तो आई ही इस शर्त पर कि मुझे घर मे नहीं रखा जाएगा । मुझे घर से बाहर निकाल दिया गया । मै बिन माँ बाप की बच्ची कहाँ जाती एक पड़ोसी के घर शरण ली पर वहाँ भी कितने दिन रहती । वहाँ से ननिहाल जाना सही लगा तो उन चाचा के साथ अपने ननिहाल आ गई । सोचा कि नाना नानी के साथ जीवन ठीक से कट ही जाएगा । परंतु अभागी मै यहाँ भी जगह न मिली , आए दिन घर मे मामा मामी का नाना नानी से झगड़ा होने लगा । इस झगड़े अंत हुआ मुझे अनाथ आश्रम भेज कर । यहाँ दीदी जो संचालन करती थी वो सभी को बड़े ही प्यार से रखती थी । कुछ समय ठीक से कट गया । अब तक मै चौदह वर्ष की हो चुकी थी और खाना बनाना , कपड़े सीना , पिरोना , सभी काम अच्छे से सीख गई थी । आश्रम का खाना बनाती और थोड़ा सिलाई का काम बाहर से ले आती तो वह भी कर लेती लोग हमारे कम से बड़े खुश थे । धीरे धीरे मैंने दीदी के साथ पढ्ना लिखना भी सीख लिया और तब के जमाने मे मैट्रिक पास कर लिया । समय कटता गया मैंने सोचा शायद अब जीवन की कठिनाइयाँ समाप्त हो गई है । परंतु कहाँ इतना लंबा जीवन था कठिनाइयाँ तो जैसे मेरी सहचरी ही हो गयी थीं । आश्रम की दीदी भी वृद्ध हो चली थीं वह चाहती थीं की उनके जीवन काल मे ही मेरा ब्याह हो जाए और मै सुख से रहूँ । प्यार और ममता क्या होती है यह मैंने उनके सानिध्य मे जाना । उन्होने मेरे लिए वर की तलाश शुरू कर दी काफी समय के बाद एक लड़का मिला जो बनारस मे एक डिग्री कालेज मे प्राध्यापक था उसकी पहली पत्नी मर चुकी थी वह मुझसे विवाह करने को तैयार हुआ । वे देखने बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व वाले थे मैंने सोचा मै साधारण नयन नक्श वाली लड़की हूँ ये क्या विवाह करेंगे लेकिन वे तैयार थे सारी बातें हमारी आश्रम वाली दीदी ने बता दी थीं और तय भी कर लिया था । एक बहुत बड़े आदमी ने मेरे ब्याह का खर्च उठाया बड़े धूम धाम से दीदी ने मेरा ब्याह किया और मै पति साथ बनारस चली गई । इधर दो महीनों के बाद पता चला की दीदी का भी स्वर्गवास हो गया है । मुझे बड़ा धक्का लगा मैंने पति से आश्रम जाने की इच्छा जताई तो वे बिगड़ गए और दुबारा फिर वहाँ न जाने की कसम भी ले डाली । मै भी क्या करती सुखमय जीवन की अभिलाषा मे उनकी बात मान ली । एक साल के बाद मैने एक सुंदर से बेटे को जन्म दिया , खुशियाँ मानो मेरी झोली मे आने को तैयार थी कि हमारे पति का तबादला बुलंदशहर हो गया , और मै मेरे बेटे के साथ अकेली घर मे रह गई । समय काफी हो गया बेटा भी बड़ा हो रहा था मैंने पति से कहा कि अब अभिनव बड़ा हो गया है अब हमे साथ रहना चाहिए यूं अकेले कब तक !! पति ने झ्ंझलाते हुए कहा - " कहो तो छोड़ दूँ नौकरी साथ मे रहने लगूँ ।"   मैंने सकुचाते हुए कहा - " मै ये तो नहीं कह रही कि नौकरी छोड़ कर साथ रहें , आप हमे भी साथ ले चलिये ।"  परंतु बहस का कोई निष्कर्ष न निकाला जा सका । कुछ दिन बाद पति देव आए तो बेटे को अपने साथ लिवा गए , मै  फिर अकेली रह गई । थोड़े दिन बाद बेटे ने चिट्ठी लिखी माँ यहाँ पापा ने मेरा दाखिला बड़े ही अच्छे स्कूल मे करा दिया है , घर भी बड़ा अच्छा है काम करने को एक आंटी आती है वही झाड़ू कटका बर्तन कपड़े और खाना बनाना सारा काम कर जाती है आप भी आ जाओ बिना आपके घर अच्छा नहीं लगता ।
और उसने घर का पता उसी चिट्ठी मे लिख दिया । मै खुशी खुशी समान बांध कर हजारों सपने बुनती हुई जा पहुंची जहां मेरा संसार था । पति ने मुझे देखा तो भड़क गए - " एकबार बताना तो चाहिए था चली आई बिना बताए" और तमाम बाते वो बड़बड़ाते रहे और मै चुपचाप सुनती रही । सोचा ऐसी भी कौन सी गलती मैंने कर दी कि ये इतना भड़क गए । लेकिन उस दिन के बाद से मेरे अपमान का जो दौर चला वो दिन प्रतिदिन बढ़ता ही गया । बेटे को भी उनका ही भूत लग गया वो भी उनका ही साथ देने लगा ।
सोचा चलो कोई बात नहीं । बेटा तो बड़ा हो ही गया था एक सुदर्शन नवयुवक बन गया था नौकरी भी अच्छी लग गयी थी सोचा ब्याह कर दूँगी बहू आएगी तो समय सुधर जाएगा । लेकिन ब्याह  की बात पक्की भी हो गई मुझसे पूछा भी न गया । यहाँ तक कि उसके घर वालों को मुझसे मिलवाया भी न गया अब ये मेरे अपमान की  इंतेहा हो चली थी ।" थोड़ा रुककर एक गहरी सांस ली फिर बोलना शुरू किया । विवाह के निमंत्रण  भी बांटे  गए पर मुझे एक बार भी शामिल न किया गया । विवाह का दिन भी आ गया मै बड़े चाव से दौड़ कर सब कम खुद ही करने लगी कि मेरा बेटा है इसके ब्याह मे मै नहीं  काम करूंगी तो कौन करेगा । बारात गई पर मुझे किसी ने न पूछा । बेटा मिलने भी न आया । मन बहुत आहत हुआ पर बहू का इंतजार करने लगी । बहू आयी स्वागत करने के लिए थाली लेकर दौड़ी आई तो सबने रोक दिया पति ने सबके सामने अपमानित कर बाहर कर दिया । मै बेटे की ओर लपकी  शायद  बेटे के दिल मे कोई जगह बाकी हो । लेकिन बेटे ने मुंह फेर लिया । अब तक सहने की ताकत भी समाप्त हो चली थी एक लक्ष्मी घर आई थी दूसरी निकाल दी गई थी । मै सीधे हरिद्वार चली आई तब से यही हूँ  लोगो सेवा करती हूँ दुखियों की सेवा करती हूँ । मैंने देखा कि भीम गोड़ा मे उनकी छोटी सी कुटिया है वही बाहर एक स्टोव रख कर वे चाय वगैरह बनाती है और इसीसे अपना खर्च निकाल लेती है । मेरे पूछने पर कि -"क्या अब तक आपके पति और बेटे मे से किसी ने आपको खोजने की कोशिश नहीं की ।"कहने लगीं कि जिसने हाथ पकड़ा था उसी ने हाथ पकड़ कर निकाल दिया था वह क्या खोजेगा । बेटे ने बेसहारा छोड़ दिया था उसको कहाँ मेरी याद  आती , हाँ एक बार बेटा और बहू आए थे यहाँ घूमने शहर मे भीड़ बहुत थी कहीं जगह न मिली थी तब मैंने यहीं ठहरा लिया था । बेटे ने कहा क्या यही आपका घर है । क्या बोलती मै कि - "कहाँ है मेरा घर।"
उनकी दास्तां काफी दुःख भरी थी मै सोचती हुई चल दी कि सही ही तो है एक स्त्री का घर कौन सा होता है माँ बाप का , पति का , बेटे का या फिर कोई नहीं ।


  

Monday, 4 February 2013

कर्कशा

लाल जोड़े मे लिपटी मालती विक्रम के साथ जब अपनी ससुराल की दहलीज पर आकर उतरी तो घर की महिलाएं मंगल गान करने लगीं –
“ मोरा बन्ना दुल्हन लेके आ गया ,
  सुंदर सुघड़ छरहरी काया
  रूप मनोहर है पाया  
  लक्ष्मी का रुप लेके आ गया ”………..
मंगल गान और तमाम रस्मों रिवाजों के साथ मालती ने घर मे कदम रखा । घूँघट की आड़ से उसने घर के हर कोने को एक ही बार मे निहार लिया । हंसी ठिठोली और मुंह दिखाई की रस्म के बाद महिलाओं ने  विक्रम की माँ से कहा – “ बहू से कुछ गाना बजाना करवा लो । हम भी तो देखे कि बहू कुछ गा बजा लेती है या नहीं । ’ विक्रम की माँ शांति देवी ने बहू से कहा – “चलो बेटा अपने भारी कपड़े बदल लो फ्रेश होना चाहो तो हो जाओ फिर थोड़ा बहुत गा बजा दो अभी रसोई की रस्म भी होनी है , मैं अभी व्यस्त हो जाऊँगी क्योंकि मेहमान भी विदा होने लगेंगे । फिर तुम आराम कर लेना ।”
मालती ने तमक कर कहा – “ मम्मी जी आप सब मेहमानों से कह दीजिये कि मै इसके लिए अभी तैयार नहीं हूँ , पहले मै थोड़ा फ्रेश हूंगी थोड़ा रेस्ट करूंगी, मुझे भूख भी लगी है कुछ खाने को भिजवा दीजिये और जाते जाते दरवाजा बंद कर दीजिएगा प्लीज़ ।”
शांति देवी उसका मुंह देखती रह गईं । मन मे सोंचने लगीं कहीं उनसे  बहू चुनने मे कोई गलती तो नहीं हो गई । यदि बहू की तबीयत ठीक नहीं है तो कोई बात नही , ये कार्यक्रम तो फिर कभी कर लिया जाएगा अभी तो पहले बहू के लिए कुछ खाने को भिजवा देती हूँ । और वे दरवाजा बंद कर  चली गईं । मेहमान महिलाओं ने चुटकी ली – “ क्या हुआ शांति,  बहू ने आने से मना कर दिया , क्या उसे कुछ आता नहीं है ।” शांति देवी ने कहा – “ अभी अभी चली आ रही है थक गई होगी बेचारी , थोड़ा आराम करने दो फिर सुना देगी ।”
विक्रम की बहन नंदनी खाना लेके भाभी के कमरे मे गई , भाभी जी सो रहीं थी । उसने जगाया – “ भाभी जी उठिए खाना आ गया है चलिये खा लीजिये ।” मालती झल्लाते हुए उठी – “ कैसे जाहिल लोग हैं यहाँ कोई चैन से सोने भी नहीं देता ।” नंदनी ने कहा “ भाभी जी सो तो आप बाद मे भी लीजिएगा अभी आइए खाना खाइये , और उसने अपनी प्लेट उठाई और खाना शुरू कर दिया तब तक मालती भी हांथ मुंह धोकर आगई । उसने देखा कि नंदनी खाना खा रही है वह कड़कते हुए बोली कि – “ क्या यहाँ किसी को इतनी भी तमीज़ नहीं है कि जिसके लिए खाना लाया गया है कम से कम उससे पर्मिशन तो ले ही ली जाए ।”  नन्दनि कुछ समझी नहीं । मालती फिर बोली – “ जाइए अपनी प्लेट उठाइए और विक्रम को भेज दीजिये । और हाँ अब बार बार कोई हमें डिस्टर्ब न करे इस बात का ध्यान रखिएगा ।” नंदनी चुपचाप उठी और चली गई । माँ के पास जाकर उसने कहा – माँ भाभी का एटिट्यूड कुछ ठीक नहीं है , हमने शायद चुनाव करने मे गलती की है ।”
शांति देवी ने समझाया कि थक गई होगी इतने दिनो तमाम रसमे करते करते थोड़ा दिमाग परेशान होगा और कुछ नहीं । चल अब तू भी खाना खा और भैया को उसके कमरे मे भेज दे । नंदनी ने भैया को कमरे मे भेज दिया । वहाँ क्या बात हुई किसी को पता नहीं चला , लेकिन विक्रम झुँझलाता हुआ माँ के के पास आकर बैठ गया । शांति देवी के दोनों बच्चे समझदार थे सो उन्होने मेहमानों के सामने कोई बात करना उचित न समझा । मेहमान भी समझ गए कि बहू ठीक नहीं है । और वे अपने घरो को वापस चले गए ।
मालती का रुख घर वालों के प्रति बहुत अच्छा नहीं था , जबकि वह खुशकिस्मत थी कि उसे विक्रम जैसा पति और शांति देवी जैसी सास मिली थी हाँ नंदनी थोड़ा हमउम्र के कारण कभी कभार खिलाफत कर लेती लेकिन माँ के समझाने से वह शांत भी हो जाती । परंतु मालती तो जैसे सबको अपना दुश्मन ही मानती थी यहाँ तक कि कोई मोहल्ले से भी अगर उससे मिलने आ जाता तो वह अपनी सास पर बिफर जाती ,सास भी अपने नाम के अनुरूप ही थीं वह हमेशा उसे समझा बुझा लेती ।  शांति देवी ने सोचा समय रहते बेटी का ब्याह भी हो जाना चाहिए ताकि ये ज़िम्मेदारी भी खत्म हो और वह चैन से अपनी आँखें बंद कर सके। विक्रम और मालती को बुला कर उन्होने मन की बात बताई । विक्रम जी जान से जुट गया नंदनी के लिए लड़का खोजने मे ।
नंदनी के भाग्य से बड़ा ही अच्छ घर वर मिला , बात फटाफट तय हो गई । चट  मंगनी पट ब्याह हो गया । ब्याह मे मालती ने खूब बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया , सब जिम्मेदारियाँ शांति देवी ने उसी को सौंप दीं थीं , उसने अपनी जिम्मेदारियाँ बखूबी निभाईं । जो  लोग एक दिन पहले तक उसकी बुराई किया करते थे वह अब तारीफ के पुल बांध रहे थे । आखिर इतना परिवर्तन मालती मे आया कैसे ?
ब्याह निपट गया नंदनी भी ससुराल चली गई , जाते जाते वह भाभी से लिपट कर खूब रोई क्योंकि दोनों ने एकदूसरे की टांग खींचने मे कोई कसर न छोड़ी  थी । माँ शांति देवी भी दुखी थी लेकिन खुश भी थी कि उनकी सब जिम्मेदारियाँ निपट गईं थीं । नंदनी के जाने के बाद शांति देवी उदास रहने लगीं थीं । एक दिन उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई उन्हे दिल का दौरा पड़ा और उन्हे अस्पताल मे भर्ती करना पड़ा । डाक्टर ने कहा उनके पास समय कम है उन्हे जितना खुश रख सकते है खुश रखिए । मालती ने यहाँ भी अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई , सास का पूरा ख्याल रखती । विक्रम और नंदनी भी आश्चर्य चकित थे । माँ ठीक होकर जब घर आगई तब एक दिन विक्रम ने मालती से पूछा कि उसका ये रूप असली है या वो रूप असली था जो पहले  दिन से देख रहा था । मालती रो पड़ी रोते रोते उसने बताया कि पापा ने आप लोगों से एक बात छुपाई थी वह ये कि मेरी माँ मेरी नहीं बल्कि सौतेली माँ है और कभी भी उन्होने इस लायक ही नहीं समझा कि मै भी कोई काम ज़िम्मेदारी से कर सकती हूँ हमेशा मुझे नीचा दिखाती रहती थी । मेरे मन मे ये बात बैठ गई थी कि मै किसी काम के लायक नहीं हूँ मै एकदम नकारा और जीवन का बोझ हूँ जिसे वे ढो रही हैं । मै इन बातों को सुन सुन कर बिलकुल पत्थर हो गई थी । शादी हुई तो यही सोच लेके यहाँ आई कि जब पीहर मे प्यार को तरसती रही तो यहाँ क्या मिलेगा । ससुराल तो ससुराल ही होती है । लेकिन माँ जी के प्यार ने मेरी ज़िंदगी ही बदल दी है मुझे ऐसा लगता है कि मै बरसों से प्यासी थी और अब जाकर मुझे पानी नसीब हुआ है । खुश किस्मत हूँ मैं कि माँ जी जैसी सास मुझे मिली है । मै दुआ करूंगी कि हर लड़की को ऐसी सास मिले । अपनी कहानी सुना कर वह चुप हो गई । विक्रम हंस पड़ा और मालती को गले से लगा लिया ।

Monday, 7 January 2013

“दहेज”


 
रात का समय था , आसमान साफ था । आसमान मे छिटके तारे और पूनम का चाँद , चारों ओर फैली चाँदनी बड़ा ही सुंदर समाँ बांध रहे थे । पूरा आसमान यूं लग रहा था जैसे किसी दुल्हन की ओढनी हो । लाला नरोत्तम दास की कोठी भी बिजली की रंगबिरंगी झालरों से सजी थी मानों एक दुल्हन की ओढनी ऊपर आसमान मे , और एक ओढनी नीचे धरती पर । क्यों न होता उस दिन कोई लड़की दुल्हन जो बनने वाली थी । कोठी का पूरा वातावरण चहल पहल से भरा था , लोग बड़ी बेचैनी से इधर उधर घूम रहे थे , लाला जी भी बेचैनी से बारात का इंतजार कर रहे थे । शहनाई की आवाज चारों ओर गुंजायमान हो रही थी और कानों मे मधुर रस घोल रही थी ।  परन्तु यही शहनाई की धुन शिखा के मन मे एक अनचाहा और अनदेखा डर पैदा कर रही थी , क्योंकि वही तो थी जो उस रात की हीरोइन थी और अपने हीरो का बेचैनी से इंतजार कर रही थी । लेकिन एक अजीब सा डर उसके कोमल मन को बार बार झकझोर देता था , पता नहीं क्यों वह खुद को इस विवाह के लिए तैयार नहीं कर पा रही थी । परंतु फिर भी वह अपने होने वाले पति का इंतजार बड़ी बेसब्री से कर रही थी । अचानक बाहर शोर गुल सुन कर शिखा की सहेलियाँ उसे छोड़ कर भाग गईं । बाहर बारात आ चुकी थी । लाला जी बड़े खुश नजर आ रहे थे आखिर उनकी मन की मुराद जो पूरी होने जा रही थी । इतने समय से जिस खुशी को वे तलाश रहे थे आज उनके द्वारे खड़ी थी । लाला पुरुषोत्तम दास का इकलौता बेटा उनका दामाद बनने जा रहा था । लाला पुरुषोत्तम दास नगर के नामी गिरामी लोगों मे से एक थे । वह उन्हे समधी के रूप मे मिल रहे थे , तो खुशी दूनी थी ही । शिखा की माँ दौड़ी गई बेटी के पास और झटपट वो सारी शिक्षाएं दुहरा डालीं जो इतने दिनों मे न जाने कितनी बार बेटी को समझा चुकी थी । फिर बाहर आकर द्वार पर आए दामाद का स्वागत करने लगीं । सखियों को भेज दिया कि वे शिखा को ले आयें ।
दूल्हा बना प्रशांत  किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहा था । सासू माँ ने दौड़ कर नजर उतारी । सभी दूल्हे की तारीफ करते नहीं थक रहे थे । इधर शिखा एक अज्ञात डर के साथ जयमाला हांथ मे पकड़े चली आ रही थी मानो कोई स्वर्ग की अप्सरा सितारों मे सज के चली आ रही हो । धीरे धीरे मंडप की ओर कदम बढ़ाते हुए वह अपनी आगामी ज़िंदगी के सपने बुनने लगी । जब उसने मंडप पर कदम रखा तो प्रशांत उसे देखता ही रह गया , जो उसकी जीवन संगिनी बनने जा रही थी । एक क्षण को वह भूल गया कि वह कहाँ है और उसे क्या करना है । शिखा की सखियों ने उसे छेड़ा कि – “ क्या हुआ जीजा जी दुल्हन बदल गयी है क्या ?”
प्रशांत हड्बड़ा गया –“ नहीं नहीं ये वही है ।’’ और सभी ज़ोर से हंस पड़े । प्रशांत झेंप गया ,शिखा भी शर्मा गयी । जयमाला कार्यक्रम शुरू हुआ । शिखा की सहेलियों और प्रशान्त दोस्तों की छेड़खानियों के बीच दोनों ने एक दूसरे को जयमाला पहनाई । शिखा का डर कुछ कम हुआ लेकिन खत्म नहीं हुआ ।
सभी फेरों की तैयारी करने लगे । लाला नरोत्तम दास और उनकी पत्नी अपने समधी के पास गए और उन्हे फेरों के लिए आमंत्रित किया । समधी जी कुछ सोचते हुए उनके साथ चल दिये ,फिर धीरे से उन्होने शिखा कि माँ और बाबू जी कुछ कहा जिसे सुनकर वे दोनों चुपचाप चले गए ।  लोगों मे काना फूसी होने लगी कि इतने बड़े आदमी है अब अपनी मांग रखी होगी , मेहमान महिलाओं ने शिखा की माँ को टटोलने की कोशिश की कि –“ दहेज मे कितना रुपया ले रहे है पुरुषोत्तम दास जी ,बड़े आदमी हैं दहेज बहुत मांग रहे  होंगे , क्या बात हो गई  ” तमाम प्रश्नों की झड़ी लगा दी लोगों ने । जितने मुंह उतनी बातें हो रहीं थीं । लेकिन वह तो गए और मंडप मे अपने स्थान पर जाकर बैठ गए । कुछ कहा ही नहीं । सभी बड़ी बेचैनी से इंतजार कर रहे थे कि क्या बात हो गई जो लाला नरोत्तम दास और उनकी पत्नी बिना कुछ बोले ही वहाँ से चले गए । फेरों का कार्यक्रम भी समाप्त हो गया । अब शिखा प्रशांत की पत्नी बन चुकी थी , लेकिन उसका डर ज्यों का त्यों बरकरार था ।
विदाई की बेला आ गई थी , शिखा अपने माँ बाबू जी से दूर नहीं जाना चाहती थी । पर माँ ने समझाया कि बेटी श्रष्टि का नियम यही है कि बेटी को एक दिन माँ का घर छोड़ कर पति के घर जाना ही होता है , वही उसका अपना घर होता है । अचानक कोई  दौड़ता हुआ आया कि दामाद और समधी ने लाला जी को तुरंत बुलाया है , लाला जी गए कुछ औपचारिक बातों के बाद वे दोनों लग्न मंडप मे आ पधारे । दामाद ने आते ही कहा कि – “ माँ मै आपसे कुछ कहना चाहता हूँ ।” सभी को साँप सूंघ गया  । शिखा की माँ के तिलक करने को उठे हाथ रुक गए ,निरीह सी वह उसकी ओर ताकने लगीं । प्रशांत ने आगे कहा –“ ये जो कुछ सामान , रुपया पैसा , जेवर , गाड़ी आप दे रहीं है वह मेरे लिए काफी नहीं है मुझे अभी भी कुछ और चाहिए, आखिर मेरे स्टेटस का सवाल है ।’ माँ रो पड़ी –“अब क्या बाकी बचा है जो इनके स्टेटस का नहीं हो पाया है ।” आँसू पोछते हुए माँ प्रशांत की तरफ लपकी – “ बेटा ! कहीं कोई कमी रह गई है क्या ? बताओ हम पूरी करने की कोशिश करेंगे । ” प्रशांत ने कहा – “ वही ठीक रहेगा आपके लिए , आखिर आपकी बेटी की खुशियों का सवाल जो है । ” सब कहने लगे देखा हम कहते थे कि बड़े लोग है तो मांग भी बहुत बड़ी ही होगी । आखिर मांग हो ही गई । प्रशांत बोला –“ जी हाँ आप लोग काफी समझदार है , पर हमारी सासु माँ ही समझदार नहीं है । विदाई तभी होगी जब मेरी मांग पूरी हो जाएगी । ” कहते हुये वह लग्न मंडप से बाहर आ गया । लाला पुरुषोत्तम दास भी मुस्कुरा रहे थे उन्होने बेटे की पीठ ठोंकी , शाबाश बेटा !  वेरी गुड। सभी सकते मे आ गए । अब क्या होगा । इधर शिखा को कांटो खून नहीं ,जिसका डर था वही हुआ । लाला नरोत्तम दास और उनकी पत्नी ने कहा बेटा  - “ बोलो हम तुम्हारी फरमाइश जरूर पूरी करेंगे ।” प्रशांत बोल पड़ा – “ तो सुनिए मुझे एक ममतामयी माँ चाहिए जो मुझे ढेर सारा प्यार और अनमोल आशीर्वाद दे सके , और वह आप ही दे सकतीं हैं , क्योंकि जैसा कि आप जानतीं ही हैं कि मेरी माँ नहीं हैं मुझे सिर्फ आपका प्यार , दुलार और मीठी सी डांट चाहिए । बोलिए देंगी आप मुझे हमेशा हमेशा , मुझे दामाद नहीं अपना बेटा मानेंगी आप । क्या ये दहेज दे रहीं हैं ? तभी आपकी बेटी को विदा करा कर ले जाऊंगा नहीं तो अपनी बेटी अपने पास ही रखिए । ” शिखा की माँ खुश हो गईं ,खुशी के आँसू उनकी आँखों से बह निकले उन्होने प्रशांत को गले से लगा लिया और बोलीं –“  बेटा पिछले जन्म मे मैंने जरूर बड़े पुण्य किए होंगे तभी तेरे जैसा दामाद मिला है , बड़ी किस्मत वाली है मेरी शिखा जो तेरी जीवन संगिनी बन कर जा रही है ।” लाला पुरुषोत्तम दास बोले समधिन जी ये हमारे प्रशांत की जिद थी की वह थोड़ी देर आपको परेशान करेगा , मैंने भी थोड़ा साथ दिया मुझे क्षमा कर दीजिये । सारा माहौल खुशी से भर उठा । और विदाई समारोह खुशी से सम्पन्न हो गया । शिखा विदा होकर अपनी ससुराल आ गई । उसकी निगाहों मे प्रशांत की इज्जत बहुत बढ़ गई ।

Tuesday, 18 December 2012

चाचा का कोट

जगुआ चाचा बड़े ध्यान से अपने नए कोट को देख रहे थे । उन्होने अपने पोते को मना किया था कि वह कोट न बनवाए , उन्हे जरूरत नहीं है । लेकिन वह नहीं माना और  बनवा ही लाया बढ़िया गरम कोट । वह जानता था कि उसके दादा जी को कोट  कितना पसंद है परंतु वह शायद यह नहीं जानता  था पुराने कोट मे दादा जी पुरानी यादें भी जुड़ी हैं ।

जगुआ चाचा को अपने पुराने दिन याद आने लगे , जब वे छोटे थे । जगुआ चाचा अपने आठ भाई बहिनों मे सबसे छोटे थे । तीन बहिने बड़ी उसके बाद दो मे  भाई फिर दो बहिनें और बाद वे खुद थे । सबसे छोटे होने के कारण सबके दुलारे भी थे , सभी भाई बहिन उन्हे बहुत प्यार करते थे । घर मे माता पिता के अलावा आजी बाबा भी थे जो उन्हे प्यार करते थे ।  उसी गाँव  की पाठशाला  में सभी भाई थोड़ा बहुत पढ़ आया करते । लेकिन उन दिनों बेटियों की पढ़ाई पर बड़ी सख्त पाबंदी थी , लोगों का कहना था  कि लड़कियां पढ़  लिख कर बिगड़ जाएंगी । इसलिए बहिने घर पर ही भाइयों की किताबों से थोड़ा बहुत पढ़ लिया करती थी , और रामायण पढ्ना , पत्र लिखना सीख गयी थी  ।  
जगुआ चाचा उस समय बहुत छोटे थे , जब सभी भाई बहिनो की एक एक कर शादी ब्याह होने लगे । बहिने ससुराल चली गई और घर मे भाभियाँ आ गईं । अब तक चाचा भी आठ नौ साल के हो गए थे ।
 अम्मा ने सोचा कि-"अब केवल जगुआ ही ब्याह वास्ते बच रहा है अब इसका भी ब्याह काज निपटा दें तो गंगा नहाये ।"
पर चाचा मजे से अपना जीवन जीना चाहते थे उसके लिए ब्याह करना काहे को जरूरी है ? गए भाभी के पास अल्टिमेटम दिया कि अगर ब्याह करवाया तो मै घर छोड़ कर चला जाऊंगा ।
सबने समझाया कि -" अब तो तू बड़ा हो गयो है एही वास्ते तेरो ब्याह हो जानो जरूरी है ।"
अम्मा ने समझाया कि - "अब मै बूढ़ी हो रही हूँ अब हाथ पाँव चलते नहीं । तेरी सेवा कौन करेगा । "
तपाक से बोले चाचा - "तो क्या हुआ तुम बूढ़ी हो रही पर भौजी तो बूढ़ी नहीं हुईं है वह मेरी देखभाल कर लेंगी । क्यों भौजी तुम करोगी न । " भौजी ने घूँघट से सिर हिला कर जवाब दिया हाँ ।

बड़े भैया बोले -"यह हमारी दुलहिनिया है हमारी सेवा करेगी , तुम्हारी थोड़े ही । तुम्हें अपनी सेवा करानी है तो अपनी दुलहिनिया खुद लाओ । " 
 चाचा दौड़े गए भाभी के गले मे अपनी छोटी छोटी बाहें डाल कर लटक गए -" जा मेरी मेरी भी दुलहिनिया है , जैसे हमारी तुम्हारी अम्मा एक ही है बाबू एक ही है तो जा दुलहिनिया भी हमारी ।" पूछा भाभी से कि -" काहे भौजी तुम काहे नाही कहती कि तुम हमारी भी दुलहिनिया हो । " भाभी ने सिर हिलाया बोली -" नाही रे ! अपनी दुल्हिन तो खुद को ही लानों  होत है । "

काफी लड़ाई  और  मान मनौव्वलके बाद थोड़ा राजी हुए चाचा पर फिर पूछा कि -"हमे क्या मिलेगा ? 
 " अम्मा बोली -" बउआ तुम्हें नए कपड़े , नए जूते , टोपी , साइकिल , और  नोटों की चमकीली वाली  माला मिलेगी और बाजा भी मिलेगा साथ मे दुल्हिन मिलेगी जैसी भैया के पास है । वो तुम्हारी खूब सेवा किया करेगी ।  "
 चाचा बोले -" भैया को हम अपनी दुलहिनिया नाही देंगे , भैया ने हमे अपनी नाही दी है ।"
 सब हंस पड़े ठीक है ठीक है तुम न देना । चाचा बोले साहब वाला कोट मिलेगा कि नही । पिताजी बोले "अभी तुम छोटे हो जब बड़े हो जाओगे तब साहब वाला कोट भी बनवा देंगे । "
 बड़े धूम धाम से जगुआ चाचा का विवाह हुआ । बहू घर आ गई । अम्मा ने एलान कर दिया की " देखो बहुरिया हमाए बउआ का ध्यान राखियो जो वो कहे वही करियो यही खातिर हम तुम्हें लाएँ है । "
छोटी सी चाची तमक कर बोली - "जे का बात हुई हमाइ बात कौन मानेगा । " 
अम्मा ने कहा- " बउआ  ही तुम्हारी बात मानेगा ।"छोटी सी चाची खुश हो गई । लंबा सा घूँघट निकाले छोटे छोटे हाथों मे ढेर सारी लाल चुड़ियाँ पहने पाँवों मे छम छम करती पायल पहने चाची जब चाचा के सामने से गुजरती चाचा  तपाक से बोल उठते- " ए छमिया ! चल मेरे पाँव  दबा । "
 चाची झट से कहती -" काहे हम काहे दबाएँ  तुम्हाए पाँव , काम तो हम कर रही है पाँव तो हमाए दर्द कर रहे है , तुम्हें खुद ही हमाए पाँव दबाने चाहिए ।" सभी भौजिया खिलखिला कर हंस पड़ती । दोनों छुप कर भाग जाते ।
 बचपन ऐसे ही लड़ते झगड़ते हंसी ठिठोली करते बीत गया । दोनों बचपन से युवावस्था मे पहुंचे । चाचा भी गाँव की पाठशाला से निकल कर शहर के बड़े कालेज मे पढ़ने चले गए । बड़ी लगन और मेहनत से पढ़ाई की और कालेज मे अव्वल आए । सारे मेधावी छात्रों को एक अङ्ग्रेज़ अफसर आकर सम्मानित करने वाले थे । चाचा ने सोचा धोती पहन कर बड़े अफसर के सामने जाना अच्छा नहीं लगेगा सो एक कोट बनवा लेते है । बाजार जाकर कपड़ा लिया और सिलने दे दिया बारह रुपए सिलाई भी दे दी । कोट पैंट पहन कर चाचा बड़े ही शान से जब मंच पर चढ़े , तो तालियों की गड़गड़ाहट ने उनका स्वागत किया । फूल कर कुप्पा हो गए चाचा । फिर तो चाचा आगे बढ़्ते गए बढ़िया नौकरी भी मिल गई । चाचा अपनी छमिया को अपने साथ ले आए ।  दो बच्चे भी हुए एक बेटा और एक बेटी । खुशी का कोई मौका हो चाचा अपना कोट जरूर पहनते । बच्चों का कोई स्कूल का उत्सव हो या घर की बर्थ डे पार्टी ,  बेटी , बेटे का ब्याह किया वही पुराना कोट पहना । बेटे ने कहा भी--" क्या पापा आप भी , अब आपका बेटा कमा रहा है नया सूट तो बनवा ही सकता है ।" बढ़िया गरम सूट का कपड़ा ले आया परंतु चाचा ने उस कपड़े से उसके लिए ही सूट सिलवा दिया । और अपने पुराने सूट की खूबिया भी गिनवा दीं - "बेटा तुम इस कोट की कीमत क्या जानो ? यह कितना कीमती है, यह तब मैंने बनवाया था जब इक्का दुक्का लोग ही कोट बवाया करते थे या फिर अंग्रेज़ लोग ही कोट पहने दिखते ।"  और भी न जाने क्या क्या ।   बेटा विवाह करके विदेश चला गया उसकी नौकरी वहाँ थी , उसकी मजबूरी थी । चाची ने बहू को बेटे के साथ भेज दिया । चाचा और चाची की भी उम्र ढलने लगी अब कम दिखाई पड़ता और काम भी न होता । अकेले जीवन भी कठिन होने लगा था ,एक दूसरे का साथ ही जीने का सहारा था । हालांकि चाचा के मित्र बहुत थे सुबह सैर सपाटे के लिए निकल जाते । लौट कर छाछ पीते और गप्पे लगाते । बेटा बहू का फोन आ जाता तो खोज खबर मिल जाती , कुछ समय खुशी से निकल जाता । एक दिन फोन आया बहू ने दो जुड़वा बेटों को जन्म दिया है , चाची ने बहू को तमाम नसीहते दे डाली- " सुन बेटा ठंड से बचना और पानी उबाल कर पीना , बच्चों की समय समय पर मालिश भी करती रहना, ऊपर का दूध  बिलकुल न देना , काला टीका बच्चों को जरूर लगाना।" हँसते हुए बहू ने कहा - "जी माँ जी, आप बिलकुल चिंता न करें । आपकी बातों का मै पूरा ध्यान रखूंगी ।" और चाची ने खुशी मे  शगुन के गीत भी  गुनगुना डाले । चाची का बड़ा मन था की एक बार बेटा बहू के पास चली जाएँ , बच्चों को देख आयें । चाचा ने समझाया -" तुम नाहक परेशान हो रही हो वहाँ देखभाल करने को लोग होते है फिर मै भी तो यहाँ अकेला हो जाऊंगा। " सीधी साधी चाची  चाचा की बात टाल न पाईं । तकरीबन रोज ही बेटे बहू से बात करतीं और बच्चों की खबर लेती रहतीं । बहू ने हंसी मे कह भी दिया -"माँ जी बच्चों के आगे आप हम लोगों को तो भूल ही गईं हैं , हम भी आपके ही बच्चे हैं । " 
 " अरे नहीं रे !" मूल से सूद अधिक प्यारा होवे है ।" चाची ने मीठी सी झिड़की दी। दो वर्षों के बाद , आखिरकार वह शुभ दिन भी आया जब बहू दोनों बच्चों को लेकर उनके दादी दादा से मिलवाने आ रही है । दादी दादा ने बच्चों के लिए ढेर सारी तैयारियां की । एक छोटी सी पार्टी  अपने पोतो के आने की खुशी मे दे डाली ।  पर चाचा अपना पुराना कोट पहनना न भूले । चाची ने झिड़का - " छोड़ो भी कब तक इस पुराने कोट को सीने लगाए रहोगे , बेटा नया बनवा रहा था तो नया बन जाने दिया होता । कम से कम आज नया कोट पहन लेते ।"  बच्चे बड़े प्यारे थे उनके माता पिता ने बड़े अच्छे संस्कार दिये थे । आते ही उन दोनों ने दादी दादा के पाँव छूए । अपनी तोतली भाषा मे दादा दादी से ढेरों बाते कर डालीं ,इतने प्यारे बच्चे थे थोड़ी ही देर मे  दादी दादा की जान बन गए । कुछ दिन रह कर सब अपने अपने घर वापस चले गए । इधर चाची उदास रहने लगी , वे बच्चों को भूल न पा रहीं थीं और किसी से कह भी न पा रहीं थीं , बस फोन से जब बात होती तो उनके चेहरे की  खुशी देखते ही बनती । उम्र ढलती जाती थी, चाची बीमार रहने लगीं ,   एक दिन चाची सोई तो ऐसी सोई की फिर न उठी । चाचा एकदम अकेले रह गए । बहू बेटा आए , बेटे ने कहा अब तो पापा हमारे साथ चलिये , इसके लिए चाचा राजी न हुए, उन्होने कहा -"यहाँ तुम्हारी माँ की यादें जुड़ी हैं और फिर अपना देश अपना ही होता है, मेरे मित्र भी यहाँ है सब देखभाल कर लेंगे।"  लेकिन बहू बेटे और पोतो के आगे उनकी एक न चली , उन्हे बच्चों के साथ जाना पड़ा। मन मे यही सोचने लगे - " मै बड़ा भाग्यशाली हूँ जो मुझे ऐसे बच्चे मिले है वरना आजकल विदेश जाते ही बच्चे माँ बाप को  भूल जाते है । "  

समय बीतता गया छोटे छोटे बच्चे बड़े हो गए । आज उनका पोता भी काबिल डाक्टर बन गया था और दूसरा इंजीनियर । दोनों अपने मम्मी पापा के साथ साथ दादू के लिए भी गिफ्ट लेकर आए थे । बड़ा पोता कोट लाया था और दूसरा सुंदर घड़ी लाया था । दोनों अपनी अपनी जिद कर रहे थे दादू पहले मेरी गिफ्ट । छोटा वाला उनका हाथ पकड़ कर घड़ी पहना रहा था बड़ा वाला कोट पहना रहा था । पर चाचा अपनी धुन मे खोए थे , उन्हे लग रहा था कि  चाची उन्हे कोट पहना रहीं है । अपनी धुन मे बोल पड़े -"तुम भी क्या छमिया ? आज तक वैसी ही हो । "
दोनों लड़के बड़े ज़ोर से हंस पड़े -"अरे दादू ! ये आपकी छमिया नहीं ये हम है राम लखन ! " दादू झेंप गए ।


Sunday, 9 December 2012

डाक्टर साहिबा

               
मै जब भी उस रास्ते से निकलती डाक्टर साहिबा को अपनी क्लीनिक मे बैठा हुआ पाती । वह अपने कर्तव्य की धनी महिला थी, उनका मानना था कि डाक्टर का प्रोफेशन होता ही जनता की सेवा के लिए है और हमेशा अपने प्रोफेशन के साथ ईमानदार रहना चाहिए । जयंती नटराजन यही नाम था डाक्टर साहिबा का , बड़ी ही सौम्य महिला थी , मुझे उनका व्यक्तित्व बड़ा ही आकर्षक लगता । लंबा कद , छरहरा शरीर ,सांवला रंग , लंबे बाल , तीखे नयन नक्श , बड़ी ही लुभावनी लगती थी । मै उधर से निकलते समय उनसे जरूर मिलती । उनसे मिलकर बड़ा अच्छा लगता , उनकी बातों से मै मंत्र मुग्ध हो जाती । वे केरला की रहने वाली थी , हिन्दी टूटी फूटी ही बोल पाती , मलयाली भाषा उनकी मातृ भाषा थी ।  इसलिए मलयालम और इंगलिश भाषाओं पर पूरा कमांड था । मै जब उनके पास बैठती तो वे हमेशा हिन्दी सीखने की इच्छा जाहिर करती ,और मै उन्हे हिन्दी सिखाती , हम दोनों कई घंटों हिन्दी का अभ्यास करते ।
बातों ही बातों मे मुझे पता चला कि उन्होने प्रेम विवाह किया है , उनके पति डाक्टर कंवल जीत भटिंडा के रहने वाले थे दोनों मुंबई के मेडिकल कालेज मे साथ ही साथ पढ़ते थे , पढ़ाई खत्म होने के बाद दोनों ने अपने अपने घर वालों की सहमति से विवाह कर लिया और जयंती नटराजन अपने पति के घर आ गई । पति के घर मे बड़ी बीजी ( उनकी दादी ) का शासन चलता था । उनको साँवली सलोनी जयंती पसंद नहीं आई , उन्होने पोते से कहा – ‘ पुत्तर ए की लै के आ गया , तू छड्ड इस नू ,मै त्वाड़े वास्ते सोंडी कुड़ी लै के आवंगी । सोंडी पंजाबी कुड़ी । ‘ बात आई गई हो गई ।
जयंती बड़ी लगन से सेवा करती , खासकर बड़ी बीजी की । बड़ी बीजी उसकी सेवा से बड़ी खुश हुई । सबसे कहती नहीं थकती कि – “बड़ी ही सुघड़ है हमारी जयंती ।“ उन्होने एक क्लीनिक खुलवा दिया कि डाक्टर बहू है घर मे कब तक बैठेगी । तब से वह क्लीनिक पर बैठने लगी थी और अपने इलाज से और मधुर व्यवहार से सबका दिल जीत लेती । तीन चार साल बीत गए पर उन्हे कोई संतान नहीं हुई , दबी जुबान से लोगों ने पूछना शुरू कर दिया – “ क्या बात है बहू कोई प्रिकाशन ले रही है क्या ?” अब घर के लोगों को भी लगा कि हाँ बात तो सही है । समय रहते हो जाना चाहिए । घर वालों ने कंवल जीत से कहा कि भाई अब तो खुश खबर मिलनी ही चाहिए । कंवल जीत हंस कर टाल देते । जयंती ने सोचा सबका मन रख ले , कंवलजीत से कहा कि हमे अब बच्चे के लिए प्लान कर लेना चाहिए । पर डाक्टर साहिबा की अपनी किस्मत अच्छी नहीं थी ,काफी प्रयास के बाद भी जब उन्हे संतान सुख नहीं मिला तो उन्होने बच्चा गोद लेना चाहा, थोड़े से विरोध के बाद सहमति मिल गई । डाक्टर साहिबा ने एक प्यारी सी बच्ची को गोद लिया । सास नन्द ने कहा लेना ही था तो एक बेटा लिया होता । डाक्टर साहिबा ने उन्हे समझाया बेटी को हम बेटे की तरह पाल सकते है और बेटी का अपना अलग ही सुख होता है कहने की बात है कि बेटा घर के नाम को आगे बढ़ता है लेकिन बिना बेटी कैसे संभव हो सकता है ।           
बेटा हो या बेटी दोनों का अपना सुख होता है । मुझे ये बच्ची बड़ी प्यारी लगी इसलिए मै ले आई । बेटी बड़ी ही मोहिल थी तो बडी बीजी ने उसका नाम मोहिनी रखा । मोहिनी बड़े थोड़े ही समय मे सबकी दुलारी बन गई । घर वालों का सारा समय मोहिनी के साथ कब बीत जाता पता ही न चलता ।
  जयंती का क्लीनिक जिस जगह पर था वहीं पीछे एक छोटा सा गाँव था । वहाँ सुविधाओं के नाम पर एक पुराना जर्जर हो चुका अस्पताल , एक विद्यालय जिसको किसी ने अपने रहने का स्थान बना लिया था , दो तीन कुएं जिनमे किसी मे पानी था किसी मे नहीं । काफी खस्ताहाल गाँव था कोई मुखिया नहीं और सभी मुखिया थे । जयंती जब उस गाँव मे गई , उसे वहाँ कि दयनीय स्थिति देख कष्ट हुआ । उसने मन मे ठान लिया कि इस गाँव के लिए कुछ करना है , पहले उसने वहाँ शिविर लगाया और मुफ्त सबका परीक्षण किया , जिसको जिस इलाज की आवश्यकता थी उसे वह प्रदान की । बच्चों की पढ़ाई लिखाई सुचारु रूप से चल सके इसके लिए विद्यालय ठीक करवाया , काफी दौड़ भाग कर वहाँ अस्पताल , स्कूल , हैंडपंप इत्यादि उपलब्ध कराये । डाक्टर साहिबा उस गाँव के लोगों के लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं थी । जो डाक्टर साहिबा कहती वो उनके लिए ईश्वर का हुक्म होता , और क्यों न होता वही तो थी जिसने उनका जीवन ही बदल दिया था ।